बुधवार 1 अप्रैल 2026 - 17:01
टार्गेट किलिंग की निरंतरता; एप्सटीन कबीले का फ़िरऔनी स्वभाव

मानवीय इतिहास वह आईना है जिसमें अहंकारी ताकतों के दावेदार और पताकाधारी हमेशा अपनी हार का नक्श पढ़ते रहे हैं। मूसा के डर से फ़िरऔन ने बनी इसराइल के हर नवजात बच्चे को कत्ल करवाना शुरू कर दिया। मगर ईश्वरीय योजना कुछ और थी; वह स्वयं अपने ही घर में पलने वाले मूसा के हाथों अपमानित और बेबस हुआ। यह ईश्वरीय शक्ति का वही करिश्मा है कि ज़ालिम अपनी नासमझी की रणनीति और ताकत के अहंकार में डूबा रहता है, मगर उसका परिणाम शिक्षाप्रद और दयनीय होता है।

लेखक: मुहम्मद जवाद पारवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | मानवीय इतिहास वह आईना है जिसमें इस्तिकबार के दावेदार और पताकाधारी हमेशा अपनी हार का नक्श पढ़ते रहे हैं। मूसा के डर से फ़िरऔन ने बनी इसराइल के हर नवजात बच्चे को कत्ल करवाना शुरू कर दिया। मगर इलाही योजना कुछ और थी; वह स्वयं अपने ही घर में पलने वाले मूसा के हाथों ज़लील और ख़्वार हुआ। यह ईश्वरीय शक्ति का वही करिश्मा है कि ज़ालिम अपनी नासमझी की रणनीति और ताकत के अहंकार में डूबा रहता है, मगर उसका परिणाम शिक्षाप्रद और दयनीय होता है।

इस्लाम के शुरुआती दौर में मुआविया ने रसूल के मिम्बर से इमाम अली पर गाली-गलौच (अपशब्दो) को आम करके और उनके साथियों को सूली पर लटकाकर यह समझा कि सरकार की बुनियादें हमेशा के लिए मजबूत हो गईं। यज़ीद ने कर्बला में इमाम हुसैन के महान बलिदान को जीत समझ लिया, मगर इतिहास में ये इस्तिकबारी मोहरें न केवल अपना नैतिक ठिकाना खो बैठीं बल्कि इतिहास के पन्नों में शर्म और कलंक की निशानी बनकर रह गईं।

ताकत का यही भ्रम, इराक पर मुसल्लत सद्दाम के लिए भी अपनी सरकार के विस्तार का कारण बना। उसने यज़ीद के चरित्र को पीछे छोड़ते हुए दो कदम आगे बढ़कर नबी मुहम्मद की शुद्ध इस्लाम के पताकाधारी शहीद सद्र को उनकी बहन समेत शहीद कर दिया, ताकि कोई ज़ैनबी (हज़रत ज़ैनब जैसा प्रतिरोधी) लहजा उसके महल की बुनियादें न हिला सके। मगर ईश्वरीय नियम ने उसकी सारी कोशिशों को बेकार कर दिखाया। क्योंकि जुल्म और बर्बरता की रात जितनी काली होती है, हक और इंसाफ की सुबह उतनी ही उज्ज्वल होती है।

आज समय का फ़िरऔन अमेरिका और इसराइल भी इसी भ्रम में डूबा है। वह समझता है कि ईरान में पल रहे वर्तमान युग के "इमरान के बच्चों" (शहीद रहबर के वफादार कमांडरों और सिस्टम के ईमानदार लोगों) को एक के बाद एक शहीद करके सिस्टम में लोगों की कमी पैदा कर दी जाए तो इंकलाब की लहर थम जाएगी। मगर शायद यह नादान दुश्मन शियो के इतिहास से अनजान है और विलायत व इमामत के सिद्धांत से अब तक अपरिचित है। ताकत का नशा विलायत के सिस्टम की पहचान के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है, और यही नशा समय के ज़ालिमों को यह समझाने में नाकाम रहा है कि तशय्यु का सिस्टम व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि विलायत व इमामत की केंद्रीयता से सुशोभित है। यह सिस्टम व्यक्ति-केंद्रित नहीं, विलायत-केंद्रित है। जिसका हर कदम कर्बला के स्कूल से गुजरता है और हर शहीद अपने खून से इस सिस्टम को अमर कर देता है। इस प्रकार यह शजरा-ए-तैय्यबा जितना दबाया जाता है, उतना ही ऊँचा उठता है।

वर्तमान युग में यह वास्तविकता 7 अक्टूबर 2023 के तूफान-ए-अक़्सा के बाद और अधिक स्पष्ट हो गई। इसराइल ने हिज़्बुल्लाह के पहली पंक्ति के सभी कमांडरों को शहीद कर दिया। जून 2025 की बारह-दिवसीय ईरान-इसराइल जंग में ईरान की पूरी सैन्य अगुवाई समेत बीस के करीब महत्वपूर्ण कमांडर शहीद हुए। और रमजान की जंग में हालिया अमेरिकी आक्रमण के परिणामस्वरूप ईरान की उच्च सैन्य अगुवाई के साथ-साथ वली अम्र मुस्लेमीन, सुप्रीम लीडर भी शहादत का प्याला पी गए।

मगर यह ईरानी इस्लामी इंकलाब का सिस्टम आज भी अपने इंकलाबी तेवर के साथ दुनिया के क्षितिज पर चमक रहा है। बल्कि इस इंकलाबी चिराग के सामने दुनिया की बाकी रोशनियाँ धुंधली पड़ती जा रही हैं। शहीदों को पालने वाली इस क़ौम को कोई ताकत पराजित नहीं कर सकती। शहीद का खून न केवल इतिहास का रुख मोड़ता है बल्कि ईश्वरीय योजना को एक नई दिशा प्रदान करता है।

आज एक तरफ एप्सटीन कबीले का पूरा परिवार अपनी ताकत के नशे में मस्त है, तो दूसरी तरफ एक ईमानदार, गैरतमंद और जागरूक क़ौम है जो कई दशकों से दुनियावी घेरे में होने के बावजूद सीसा पिलाई दीवार बनकर जुल्म और बर्बरता के इस पश्चिमी ब्लॉक के सामने खड़ी है।

दुश्मन के बयानों और कार्यों में हार के निशान साफ दिख रहे हैं। हर दिन बदलते बयान, घबराहट, हर पल मदद की गुहार, टूटते शब्द और बिखरते वाक्य — सब चीख-चीख कर कह रहे हैं कि फ़िरऔनियत और यज़ीदियत का यह गिरोह इतनी हैवानियत भरी हत्याओं और लूट-खसोट के बावजूद कल भी नामुराद था और आज भी नामुराद है।

यह इतिहास, जो ज़मीन पर ख़ुदा होने के दावेदारों की कहानी और बुरे अंजाम से सजा है, आज अमेरिका और इसराइल की फ़िरऔनियत और बर्बरता से पूरी तरह मेल खाता है। यह ज़माने की कहानी बता रही है कि कैसे कुदरत का नियम जुल्म के पहाड़ों को चूर-चूर कर देता है, बातिल के चेहरे को ज़माने की निगाह में रुसवा करके रख देता है और हक व सच्चाई के झंडे को सरबुलंद रखता है।

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